Tue 24 05 2022
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About Shajapur

Shajapur District is a district of Madhya Pradesh state of central India. The town of Shajapur is the district headquarters. Shajapur District is part of the Malwa Plateau. The district is situated in the northwestern part of the state. The district is bounded by Ujjain District to the west, Dewas and Sehore to the south, Rajgarh to the east, and Jhalawar District of Rajasthan to the north. Shajapur District is part of Ujjain Division.

Shajapur district in Ujjain division was brought during 1981 census. It is situated in Madya Pradesh State of central India. Shajapur District is part of the Malwa Plateau. The district is situated in the northwestern part of the M.P. State. The Shajapur district lies between latitudes 32”06’ and 24”19’ North and longitude 75”41’ and 77”02’ East.

The District headquarter is Shajapur Town which got its name after honor of Moughal Emperor Shahjahan who halted here in 1640. The Original of the city was Shahjahanpur that subsequently changed to Shajapur. is a city and municipality.

What’s Around Shajapur?

Ujjain district is situated in the west of Shajapur district. Dewas and Sehore are situated in the south of the Shajapur district. Rajgarh is situated at the east of the district. The North part of the Shajapur district get touch with Rajasthan State’s Jhalawar district.

History of Shajapur

Shajapur is named after the Mughal emperor shahjahan, who stopped there in 1640. Prior to that the town was known as Kankdikheda. The original name was Shahjahanpur, which was later shortened to Shajapur. In the 18th century the town became part of the dominion of the Maratha leader Sindhia, founder of the state of Gwalior, and was the headquarters of a district of Gwalior state until Indian independence in 1947. After Independence, Shajapur and its district became part of Madhya Bharat state, which was merged into Madhya Pradesh on 1 November 1956.

Shajapur was recognised at the time of Shahjahan. . Observing the natural beuty of this area , Fauj of Shahjahan decided to take a halt here . This place was known as ” Khankarakhedi ” . Shahjahan and his fauj liked this place very much and consequently when Shahjahan became SAMRAT he considered the importance of this place for his Southern campaign .In 1640 Meer Bigo was appointed here as Koutwal . He with Shri jagannath Rawal prepared four DWARs in four directions . In centre a marketing centre was developed .

Consequently this area was populated gradually and converted in colony . Surrounding this place a wall was also prepared. Then in respect of king Shahjahan it was named as ” Shahjahanpur” . In Shahajahanpur twelve areas were located named Magriya,Mahupura,Dansi,Muradpura,Vajeerpura, Kamreedpura,Lalpura, Dayra, Mugalpura, Golyakhedi, Juganbadi meerkala . Muradpura was named after Shahjahan’s son and Muradpura and Meerkala were named after Meer Bigo himself .

It is said that Chadralekha river ( which is now Chiller) was flowing in North direction before but after establishment of huge fort and for its safety it was brought from East as a PARIKHA of the fort . So at the time of Shahjahan (1628-1658) Jama Maszid, so many temples etc. were developed . He was very satisfied with developments and he honored Shri Jagannath Rawal by giving Jageer of Moja magariya.

But at the time of Aurangjeb (1656-1707) , this area was totally ignored . In the 18th century the town became part of the dominion of the Maratha leader Sindhia, founder of the state of Gwalior, and was the headquarters of a district of Gwalior state until Indian independence in 1947. After Independence, Shajapur and its district became part of Madhya Bharat state, which was merged into Madhya Pradesh on 1 November 1956. The name “Shahjahanpur” was now ” Shajapur” in this period only . A beautiful palace in the fort was also developed by Tarabai .

शाजापुर के बारे में-

एक बार खांकराखेडी नामक गॉव से मुगल शासक शाहजहॉ अपनी फौज के साथ निकल रहा थे कि इस गॉव की खुबसूरती ओर प्राकृतिक सौन्दर्य को देखते ही शाहजहॉ की सेना ने यहॉ पर विश्राम हेतु पडाव लेने का फैसला लिया । मुगल बादशाह शाहजहॉ को यह जगह इतनी पसन्द आई कि सम्राट बनने के बाद दक्षिण के अभियानो को ध्यान मे रखते हुए सन 1640 मे उन्होने मीर बिगो के रूप मे कोतवाल की नियुक्ति कर दी । मीर बिगो ने श्री जग्गनाथ रावल के साथ मिलकर इस गॉव की चारो दिशाओ मे चार भव्य दरवाजे व इन चारो दरवाजो के बीच मे एक विपणन केन्द्र का निर्माण करवाया ओर धीरे –धीरे यह क्षेत्र आबादी के बसने से नगर के रूप मे बदल गया व इस क्षेत्र के चारो ओर एक दीवार को बनवाया गया । मुगल सम्राट शाहजहॉ के सम्मान मे इस नगर का नाम खांकराखेडी से शाहजहॉनपुर कर दिया गया ।

शाहजहॉनपुर मे बारह क्षेत्र स्थित थे जिनके नाम मगरिया, महुपुरा, डॉसी, मुरादपुरा, वजीरपुरा, कमरदीपुरा, लालपुरा, दायरा, मुगलपुरा, गोल्याखेडी, जुगनवाडी, मीरकला। मुरादपुरा नाम शाहजहॉ के बेटे के नाम पर और मीरकलॉ मीर बिगो ने स्वयं के नाम पर रखा ।

यह कहा जाता है कि चन्द्रलेखा नदी ( जो कि अब चीलर के नाम से जानी जाती है) पहले उत्तर दिशा की ओर बहा करती थी लेकिन विशाल किले की स्थापना के बाद ओर इसकी सुरक्षा के लिये नदी को पूर्व दिशा से किले की पारीखा के रूप मे लाया गया ।

शाहजहॉ ने अपने समय मे (1628-1658) जामा मस्जिद व कई सारे मन्दीरो का निर्माण कराया था। शाहजहॉ इन विकास कार्यो से काफी संतुष्ट थे ओर इसलिये उन्होने श्री जग्गनाथ रावल जो मौजा मगरिया की जागीर देकर सम्मानित किया ।

औरंगजेब के समय ( 1656-1707 ) इस क्षेत्र को पूर्ण रूप से उपेक्षित कर दिया गया और मुगल शासन के पतन के बाद 1732 मे शाहजहॉनपुर को सिन्धीया राज्य मे लाया गया । कई प्रशासनिक फेरबदल किये जा रहे थे व ईसी समय शाहजहॉनपुर का नाम शाजापुर कर सन 1904 मे शाजापुर को जिला घोषित किया गया था । ताराबाई द्वारा किले के अंदर एक खुबसूरत स्थान विकसित किया गया । स्वत्ंत्र भारत के बाद शाजापुर ओर इसका जिला मध्य भारत राज्य का हिस्सा बना जो बाद मे 1 नवम्बर 1956 को मध्य प्रदेश राज्य मे मिला । शाजापुर कंस वधोत्सव के लिये विश्व मे प्रसिद्ध है । शाजापुर को राष्ट्रीय कवि पंडित बाल कृष्ण शर्मा के जन्म स्थली के रूप मे भी जाना जाता है।

शाजापुर के दर्शनीय स्थल

नित्यानंद बाप जी का आश्रम, जो कि ए.बी.रोड पर स्थित हैबापू की समाधी जो कि ए.बी.रोड पर इन्दौर की ओर स्थित हैमॉ राजराजेश्वरी देवी की मूर्ती 52 शक्ति पीठो मे से एक सिद्ध मूर्ती है ,इस मन्दिर का निर्माण
राजा भोज द्वारा सन 1007 से 1009 के बीच कराया गया ।चीलर डेम जो कि शाजापुर के जीवन रेखा चीलर नदी पर बना हुआ है, वर्षा ऋतु मे इसकी सुन्दरता लोगो को आकृषित करती है ।गायत्री मन्दिर जन जागरण का केन्द्र है जो कि नगरपालिका शाजापुर के पास स्थित है ।डॉसी हनुमानमुरादपुरा हनुमानगणेश मंदीर आगरा – मुम्बई मार्ग पर स्थित है ।सोमेश्वर महादेव मन्दिरहनुमान मन्दिर व राम मन्दिर गिरवर मे स्थित है। हनुमान मन्दिर की मूर्ती पॉचवी शती की है।द्वारकाधीश मन्दिरपांडू खो कलेक्टर कार्यालय के पीछे दक्षिण की ओर स्थित, यह कहा जाता है कि पॉडव अपने
अज्ञातवास के समय इस स्थान पर कुछ समय के लिये रूके थे ।वारसी दरगाह शाजापुर शहर के मध्य मे स्थित है, इस दरगाह को संत हाजी हजरत शाह की दरगाह के नाम से भी जाना जाता है । रंगपंचमी के उत्सव पर जनता द्वारा यहॉ पर मेले व उर्स का आयोजन किया जाता है ।जामा मस्जिद चीलर नदी के किनारे बादशाह्पुल पर स्थित है ।इस मस्जिद को हैदर अली तेग द्वारा बनवाया गया था ।ओम:कारेश्वर मन्दिर किले के दक्षिणी ओर किले के पीछे स्थित है। किसी भक्त को भगवान शिव की यह मूर्ती नदी मे से मिली थी ।शिव मन्दिर, गरासिया घाट चीलर नदी के किनारे स्थित है । इस मन्दिर को पीढारीयो द्वारा बनवाया ग्या था ।भैरू ढूंगरीपूराना किलाबडे साहब चोक बाज़ार (एशिया का सबसे बडा दुलदल)युसूफी दरगाह गिरवर रोड पर स्थित है यह बोराह समाज का तीर्थ स्थाल है । यहॉ पर प्रति वर्ष लाखो श्रद्धालु तीर्थ करने के लिये देश और विदेश से आते है ।

शाजापुर के आस-पास के दर्शनीय स्थल

बाबा बैजनाथ मन्दिर, आगरमॉ बगलामुखी भारत के एक शक्तिपीठो मे से एक है जो कि जिला मुख्यालय से 70 कि.मी. दूर
नलखेडा मे स्थित है ।जैन मन्दिर जो कि जिला मुख्यालय से लगभग 25 कि.मी. दूर मक्सी मे स्थित हैझरनेश्वर मन्दिर जो कि मक्सी से पॉच कि.मी. दूर ग्राम सिरोलिया के अमरकुंज के पास झरन (बह्ते पानी) मे स्थित है । झरन (बह्ता हुआ पानी) अब एक कुंड के रूप मे बदल चुका है। शिवरात्रि पर्व पर श्रद्धालु यहॉ मेले का आयोजन करते है । चुकि यह मन्दिर झरने के पास हे इसलिये इस मन्दिर को झरनेश्वर मन्दिर कहा जाता है ।करेडी माता मन्दिर जिसे महाभारत के कर्ण द्वारा जिला मुख्यालय से 15 कि.मी. दूर उज्जैन- शाजापुर के बीच बनवाया गयामहाकालेश्वर मन्दिर , जो कि पूरातनकाल से सुन्दरसी मे स्थित है, यह स्थान एतिहासिक माना जाता है । सुन्दरसी का नाम राजा विक्रमादित्य की बहन सुन्दरबाई के नाम पर रखा गया, इसलिये इस स्थान को सुन्दरगढ के नाम से भी जाना जाता है ।पालेवाले बाबा का मन्दिर ,खरदौनकलॉमनकामनेश्वर महादेव मन्दिर ,कुमारीयाखासभैसवा माता मन्दिर , सारंगपुरमालवा का कश्मीर, नरसिहगढ जो कि अपनी नैसर्गिक अलोकिक खुबसूरती, पुरातत्व महत्व, व
वन्य जीवन व कई धार्मिक मन्दिरो के लिये प्रसिद्ध है । नरसिहगढ शाजापुर से 125 कि.मी. दूर है ।महाकाल मन्दिर, उज्जैन जो कि शाजापुर से लगभग 65 कि.मी. दूर है ।

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