Tue 07 12 2021
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मौलिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता जरूरी- न्यायाधीश

मौलिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता जरूरी- न्यायाधीश

शाजापुर। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के तत्वावधान में विधिक साक्षरता एवं जागरूकता कार्यक्रम का रविवार को ग्राम मदाना में आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ प्राधिकरण के सचिव राजेन्द्र देवड़ा ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलित कर किया। जिला न्यायाधीश एवं अध्यक्ष जिला विधिक सेवा सुरेन्द्रकुमार श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम में न्यायाधीश देवड़ा ने कहा कि हर नागरिक को देश के प्रतीक चिन्ह और राष्ट्र गान का आदर तथा सम्मान करना चाहिए। साथ ही मौलिक अधिकारों के हनन पर कानून की मदद लें। उन्होने कहा कि देश की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझना हर नागरिक का कर्तव्य बनता है। उन्होने बताया कि जागरूकता शिविर का उद्देश्य लोगों को संविधान, अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति जागरूक करना है। उन्होने कहा कि बच्चों को मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए नारा एवं निबंध लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाएगा। सभी नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों व कर्तव्यों की जानकारी होनी चाहिए। सभी पढ़े-लिखें और भारतीय संविधान की प्रस्तावना का ज्ञान भी रखें। बाल श्रम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बाल श्रम करवाने के दोषी को सजा हो सकती है। इस दौरान बाल श्रम प्रतिबंध एवं विनियमन अधिनियम 1986, बच्चों को कानूनी सेवाएं नालसा योजना 2015, पॉस्को एक्ट 2012 तथा बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के बारे में जागरूक किया। उन्होने कहा कि 14 वर्ष तक के बच्चों से बाल श्रम करवाना कानूनी अपराध है। संशोधन के बाद यह कानून 14 से 18 वर्ष तक के किशोरों को भी खानों तथा जोखिम भरे रोजगारों पर पाबंदी लगाता है। बाल श्रम करवाने के दोषी को छह माह से दो वर्ष तक की कैद व 20 हजार से 50 हजार रुपए तक का जुर्माना किया जा सकता है। बच्चों का कल्याण, मुफ्त कानूनी सहायता पाने का, गरिमा का, समानता का,  शोषण के विरूद्ध सुनवाई का, सुरक्षा का, पुनर्वास योजनाओं का लाभ पाने के अधिकार प्राप्त है। बच्चों को बाल श्रम के साथ-साथ बाल विवाह व यौन अपराधों के खिलाफ भी कार्रवाई कराने का अधिकार प्राप्त है। वहीं शिविर में मौजूद न्यायाधीश प्रवीण शिवहरे ने कहा कि मानसिक रूप से व्यथित व्यक्तियों के परिजनों को उनके प्रति सद्भावना और सेवा की भावना रखते हुए उनका ध्यान रखना चाहिए। उचित उपचार सुयोग्य चिकित्सकों के मार्गदर्शन में उपचार कराने से उनकी व्यथा निवादित हो सकती है। न्यायाधीश ने अस्वस्थ व्यक्तियों को सभ्य समाज में अलग-थलग न करके उन्हें पूरा स्नेह और सम्मान करने पर बल देते हुए युवाओं और बुजुर्गों को सामंजस्यपूर्वक मानसिक अस्वस्थ व्यक्तियों की सेवा करने हेतु प्रेरित किया। इस दौरान उन्होने बताया कि मध्यस्थता के माध्यम से न्यायालयों में लंबित राजीनामा योग्य प्रकरणों के निराकरण करवा सकते हैं। मध्यस्थता में दोनों पक्षों को समानता के आधार पर सुना जाता है और उनके मतभेदों को दूर कर आपसी सामंजस्य से प्रकरण का निराकरण करवाया जाता है। मध्यस्थता में न किसी व्यक्ति की हार होती है न जीत होती है क्योंकि मध्यस्थता विवादों के निराकरण काअच्छा माध्यम है जिसमें दोनों पक्षों को समान न्याय सुलभ किया जाता है। कार्यक्रम के अंत में नेशनल लोक अदालत के माध्यम से प्रकरणों के निराकरण के संबंध में होने वाले लाभों से अवगत कराया गया। इस अवसर पर गांव के सरपंच, सचिव, पैरालीगल वालेंटियर्स सहित ग्रामीण उपस्थित थे।

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