Sun 15 05 2022
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प्रथम शहीद कोरोना योद्धा : कबरसिंग

प्रथम शहीद कोरोना योद्धा : कबरसिंग

कुछ वर्ष पुर्व की बात हैं मुझे बाग जाना था। सोचा बाग कोई उद्यान होगा पर पहुचा तो पता चला ये एक कसबा है। जहाँ आदिवासी संस्कृति अपने प्राकृतिक रूप से फल फूल रही है।
बात उन दिनों की है जब बरसात का मौसम था। हम जिस क्वाटर में बसे थे वह अंग्रेजो के काल में बना पुलिसिया थाने का एक भाग था। उसमें पानी भी जगह जगह से टपकता था और प्लस्तर भी।

बस मुझे वहाँ की अध्यात्मिक शांति भा गई थी जो एक छोटे शिवालय से निर्मित होती थी। हम रोज पास ही मिट्टी के बने छोटे बडे़ बर्तनों में पानी भरा करते थे जिसमें संतोषभाई प्राय: हमारा सहयोग करते थे। नित्य प्रति पुष्प से शिवलिंग का श्रंगार करना भी उनदिनों मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया था। वातावरण तो वहाँ का स्वत: ही सुरम्य था जिसमें सबका अपनापन उसे और भी मोहक बनाता था। वहाँ के पुलिस स्टॉफ की तो बात ही निराली थी। सब अपने कर्तव्य कर्म को जिस दायित्व बोध और निष्ठा से करते वह अप्रतिम था।
उन दिनों लगातार बरसात होने से हम ड्यूटी ही कर पाते थे। भोजन के लिये सब्जियों का प्रबंध कुछ दिनों से बंद सा हो गया था तो अल्पाहार से ही काम चला लिया करते थे। वो भी कब तक।
यह सब देख हमारे प्रिय साथी और सहकर्मी कबरसिंग को रास नहीं आता था वो प्राय: हमें उनके घर भोजन पर बुला लिया करते थे उनकी सदाशयता देखकर मेरा भी मन मना करने का नहीं होता था। उनका घर घनघोर बीहड़ में था। जहाँ भारत की ग्राम्य व्यवस्था के समग्र दर्शन हो जाया करते थे। उनका घर फलिया में था। वे मोहल्ले को प्राय: फलिया कहते हैं। उनका घर बांस और मिट्टी का था। उनके घर जाने पर उनका सारा परिवार हमारी मेजबानी में लग जाया करता था। वो अक्सर अतिथियों का स्वागत ताड़ी से करते थे पर मेरा स्वभाव उन्हें पता था वे वही तक सीमित रहते थे। उनके माता पिता अथक परिश्रमी थे जिसकी महक वहाँ के माहौल से हमें मिल जाया करती थी। कबरसिंग हमें भगोरिया, चौदस, गलबजी, घट स्थापना, दिवासा-नवाई, बाबदेव और पाटला पूजा, पिथोरा-इंद आदि जनजाति के मुख्य त्योहारों में भी शामिल करने की कोशिश करता था। वो होली, दिवाली, राखी भी खुशी के साथ मनाता था। उनके संस्कार, आदतें, रीति-रिवाज, त्यौहार, जीवन जीने का तरीका, आहार, पहनावा, जीवन शैली सब आदिवासी ही थी पर कबरसिंग का शहरी जीवन से तालमेल भी गज़ब का था। कबरसिंग अद्भुत प्रतिभाशाली थे। मरीजों को चिकित्सकीय सहायता देने में तो बेजोड़ थे, निपुर्ण थे। और व्यवहार कुशलता में तो अतिशय पारंगत। आतिथ्य सत्कार तो ऐसा की भोजन किये बिना जाना ही नहीं। भोजन का प्रस्ताव अस्विकार करने पर दोस्त और अधिकारियों से लड़ भी लेते। मैं विनोद में उन्हें कौतुकी कहा करता था।
दिन बीतने पर मेरा भी तबादला अपने ग्रह जिले में हो गया पर कबरसिंग के दो दशरथी वचन स्मरण में बने रहे। वो कहा करता था डाकसाहब मेरी शादी में जरूर बुलाउगा और दूसरा की कभी आपका यहाँ भव्य कवि सम्मेलन करवाउंगा। पर शायद विधाता को दोनो मंजूर नहीं थे। कबरसिंग कोरोनाकाल के वे पहले योद्धा बने जो लोगो की सेवा करते करते पीपीई किट में ही अंतहीन यात्रा पर हम सबको छोडकर चले गये। उनका जाना जाना नहीं था हम सबके लिये अब एक संदेश बन गया कि कर्म क्षेत्र में योद्धा बन लड़ो कड़ा संघर्ष करो धैर्य और साहस से इस महामारी से लड़कर हिन्दुस्तान को फिर से खड़ा कर दो। मानवता के हित के खातिर सीना तान युद्ध लडों।
कबरसिंग ने अपातकालीन समय में न जाने कितनी दुर्घटनाओं से जनसामान्य की रक्षा की थी। सैकड़ों महिलाओं को एंबुलेंस में ही सुरक्षित प्रसव कराया जिससे बच्चे और माता का जीवन समय पर सुरक्षित हो सका। कोरोना काल के भयानक दौर में भी वह अपने जीवन की परवाह न करते हुए उन रोगियों की सेवा करता रहा जिनसे दहशत के कारण उनके परिजन भी दूर रहे।
उन दिनों कोविड के मरीजों को परिजन भी हाथ लगाने को तैयार नहीं थे तब भी वो भारत माता का लाल अपने प्राण छोड़ने से पहले भी किसी के प्राण की रक्षा करने में लगा हुआ था। उनके साहस और शहादत ने हमें बताया की कोरोना उन्नीस है तो हम इक्कीस हैं यह जज्बा हमें दिया। हमें संग्राम का मार्ग दिखाया कि कोरोना हमसे हारेगा जरूर एक दिन।
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रचयिता –
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जितेन्द्र देवतवाल ‘ज्वलंत’
[ लेखक अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कवि, साहित्यकार एवं पीएचडी शोधार्थी हैं। ]
निवास : 174/2, वन्देमातरम, आदर्श कालोनी हनुमान मंदिर के पास, शाजापुर- 465 001 [मध्य प्रदेश]
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 सम्पर्क मोबाइल : 91794 82452

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