Sun 29 11 2020
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वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई जयंती के मौके पर कार्यक्रम आयोजित

वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई जयंती के मौके पर कार्यक्रम आयोजित

शाजापुर। साहस, शौर्य और संघर्ष की त्रिवेणी है लक्ष्मीबाई। पराक्रम की पराकाष्ठा है लक्ष्मीबाई। मनु मासूम थी, छबीली सुंदर गुडिय़ा थी, लेकिन संकट की घड़ी में तलवार का पानी बन गई झांसी की महारानी। वह स्वतंत्रता संग्राम का पहला अध्याय है। वह शक्ति स्वरूपा चंडी का पर्याय है। वह परदेशी के अन्याय के खिलाफ स्वदेश का न्याय है। आज हम गौरव से उनका गुणगान करते हैं उन्हें श्रद्धा से प्रणाम करते हैं। यह बात कथा वाचक पंडित श्याम मनावत ने महूपुरा स्थित गरासिया घाट पर महिला समन्वयक विभाग द्वारा गुरुवार को वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई जयंती के मौके पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही। पं. मनावत ने मातृशक्ति को संबोधित करते हुए कहा कि विपत्ति की घडिय़ों में पुरुष आगे आता है, परंतु जब महा विपत्ति घेर लेती है और पुरुष कंधे डाल देता है तब नारी ही आगे आती है। इतिहास में ऐसी अनेक नारी चरित्र हैं जिन्होने घोर संकट में अपना कर्तव्य का निर्वाह किया है। पुरुष शक्तिमान हो सकता है, किंतु शक्ति तो स्त्री को ही माना गया है। स्वयं भगवान राम कहते हैं घन घमंड नभ गरजत घोरा, प्रिया है नरपत मन मोरा।। शक्ति के बिना शक्तिमान भी भयभीत है, स्त्री धन की शक्ति बनती है तो लक्ष्मी का रुप रख लेती है। ज्ञान की शक्ति बनती है तो सरस्वती बन जाती है और जब वह शौर्य की शक्ति बनती है तो वह दुर्गा बन जाती है। अंग्रेजों को यह पता नहीं था कि भारत में महिलाएं भी फौजी बन जाती हैं। महारानी लक्ष्मीबाई महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं जिसने अपने देश सम्मान के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया और महिलाओं की शक्ति का अंग्रेजों को अहसास कराया। कार्यक्रम में निरंजन अखाड़ा उज्जैन की 1008 महामंडलेश्वर मंदाकिनी दीदी ने कहा कि वर्तमान में महिलाएं अपनी शक्ति भूल गई हैं और आज की जरूरत है कि महिलाओं को दुर्गा का रूप लेना होगा और विधर्मी शक्तियों को अपनी ताकत का अहसास कराना होगा। महिलाओं को अपनी संस्कृति के साथ भी चलना होगा, क्योंकि महिलाओं के सिर पर पल्लू होगा तो वह बहन जी होगी और पल्लू नहीं होगा तो वह मैडम बन जाएगी, इसलिए महिलाओं को हमारी संस्कृति के अनुरूप बहन का फर्ज निभाते हुए राष्ट्र कार्य करने की आवश्यकता है। कार्यक्रम के दौरान कथाकार अनुराधा नागर ने भी संबोधित करते हुए महारानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर प्रकाश डाला और वर्तमान में महिलाओं को अपनी संस्कृति के अनुरूप कैसे रहना है और कैसे अत्याचारों से मुकाबला करना है इस बारे में बताया। इस अवसर पर प्रांत संस्कृति प्रमुख गोपालकृष्ण महाराज, उदासीन अखाड़ा की महंत प्रतिभा पांडे, बाल कथा वाचक दुर्गा दीदी, ऋषिराज गिरी भी मंचासीन थे। संचालन सुश्री अर्चना शर्मा ने किया तथा आभार दुर्गेश गोठी ने माना।

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